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संतोंकी कथाएं !




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Article Image संत मच्छिंद्रनाथजीका जन्म
एक बार शिवजी क्रोधवश कैलाश पर्वत एवं गौरीको छोडकर एक घनघोर जंगलमें आकर रहने लगे तथा वहीं समाधिस्थ हो गए । गौरीने बहुत ढूंढा; परंतु शिवजी नहीं मिले । अचानक नारदमुनि वहां आए ।

Article Image श्री गणेशदास
एक सत्पुरुष काशीक्षेत्रमें रहते थे जिन्होंने पुराण एवं उपनिषदोंका पूर्ण अध्ययन किया था । उनका नाम ‘गणेशदास' था । जैसे महाराष्ट्रमें रामदास वैसे ही काशीक्षेत्रमें गणेशदास !

Article Image अहंकार
शंकराचार्य हिमालयकी ओर यात्रा कर रहे थे । तब उनके साथ उनके सभी शिष्य थे । सामने अलकनंदा नदीका विस्तीर्ण पात्र था ।

Article Image स्वामी दयानंदजीका दृष्टांत
स्वामी दयानंदजीके विषयमें एक सुंदर कथा कहते हैं । स्वामी दयानंदजी एक बार ऋषिकेश गए थे । उस कालखंडमें अनेक सिद्ध पुरुष ऋषिकेशमें जाकर वास्तव्य किया करते थे । आज भी ऐसा कहा जाता है कि, हिमालयके परिसरमें अनेक सिद्ध पुरुष वास कर रहे हैं ।

Article Image ईश्वरका नामजप करनेवालोंको कालका भय नहीं होता
संत कबीरजी एक बार बाजारसे जा रहे थे, मार्गमें उनको एक व्यापारीकी पत्नी चक्की पिसती दिखाई दी । चक्कीको देखके कबीरजीको रोना आ गया ।

Article Image संतोंकी सर्वज्ञता
बच्चों, संत ईश्वरका सगुण रूप होते हैं । इसलिए ईश्वरके सभी गुण उनमें दिखाई देते हैं । संतोंपर श्रद्धा होनेवाले भक्तोंको इसकी प्रचीती अनेक बार आती है; परंतु कुछ लोगोंको इसपर विश्वास नहीं रहता ।

Article Image महान विठ्ठलभक्त संत सेनाजी
बच्चों, महाराष्ट्रकी संत शृंखलामें मध्यप्रदेश प्रांतके संत सेना महाराजजी भक्तिमेंअद्वितीय स्थान रखते हैं । उनका जन्म मध्यप्रदेशके बांधवगड संस्थानमें हुआ । वेपंढरपुरके एक महान वारकरी संत थे ।

Article Image भक्तवत्सल पांडुरंग
बालमित्रो, पांडुरंगके परमभक्त संत तुकाराम निरंतर पांडुरंगके नाममें तल्लीन रहते थे । उनके घरमें उनके पिताजीका श्राद्ध था । श्राद्धका अर्थ है मृत हुए व्यक्तिकी पुण्यतिथि ।

Article Image ज्ञानेश्वरीकी विशेषताएं
‘ज्ञानेश्वरी’ ग्रंथ महाराष्ट्रके संत ज्ञानेश्वरने बारहवीं शताब्दीमें लिखा । शक १२१२(इ.स.१२९०)में प्रवरा तटपर स्थित नेवासे गांवके मंदिरमें एक खंभेका आधार लेकर संत ज्ञानेश्वरने भगवतगीताका भाष्य किया.....

Article Image टेंबेस्वामी : श्री वासुदेवानंद सरस्वती
इनको श्री टेंबेस्वामीजीके नामसे भी जाना जाता है । इनका वास्तविक नाम वासुदेव था; पिताजीका नाम गणेशभट्ट, माताजीका नाम रमाबाई और दादाजीका नाम हरीभट्ट था ।

Article Image उपासनाका मार्ग
संपूर्ण जगत् जब शांत सोया हुआ होता है, तब रामकृष्ण परमहंस निर्जन घने वनमें वृक्षके नीचे ध्यानमग्न होकर कालीमाताकी उपासना करते थे ।

Article Image संत नामदेव
एक बार संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव दोनों एक साथ तीर्थयात्रापर निकले । वाराणसी, गया, प्रयाग घूमते-फिरते वे औंढ्या नागनाथ पहुंचे ।

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