उत्सव मनानेकी पद्धति
‘प्रदेशानुसार फाल्गुनी पूर्णिमासे पंचमीतक पांच-छः दिनोंमें, कहीं दो दिन, तो कहीं पांचों दिन होली मनाई जाती है ।
आईए जान लेते हैं इसे मनानेकी शास्त्रोक्त पद्धति
कृति : किसी देवालयके सामने अथवा सुविधाजनक स्थानपर सायंकाल होली जलाते हैं । बीचमें एरंड, माड, सुपारी अथवा गन्ना खडा करते हैं । उसके चारों ओर उपलों एवं लकडियोंकी रचना करते हैं । प्रथम कर्ता शूचिर्भूत होकर, देशकालका उच्चारण कर संकल्प करता है - ‘सकुटुम्बस्य मम ढुण्ढाराक्षसीप्रीत्यर्थं तत्पीडापरिहारार्थं होलिकापूजनमहं करिष्ये ।’ तदुपरांत ‘होलिकायै नमः ।’ मंत्र बोलते हुए होली जलाते हैं । होली जलनेपर उसकी परिक्रमा कर, उलटे हाथसे शंखध्वनि करते हैं । होलीके पूर्ण जलनेपर, दूध एवं घी छिडककर उसे शांत करें एवं तदुपरांत इकट्ठे हुए लोगोंमें नारियल, पपनस (चकोतरा) जैसे फल बांटें । अगले दिन प्रात:काल होलीकी राखको वंदन करें । यह राख शरीरको लगाकर स्नान करें, जिससे आधि-व्याधिकी पीडा नहीं होती । (आधी अर्थात् मानसिक व्यथा अथवा चिंता एवं व्याधि अर्थात (शारीरिक) रोग ।) सवेरे अश्लील शब्दोंका उच्चारण कर होलीकी धूलि विसर्जित करें । उसके उपरांत होलीसे प्रार्थना करें ।
धूलिवंदन
चैत्र कृष्ण प्रतिपदापर धूलिवंदन किया जाता है ।
रंगपंचमी
चैत्र कृष्ण पंचमीपर रंगपंचमी मनाई जाती है । (आजकल अनेक स्थानोंपर होलीके अगले दिन रंगपंचमी मनाई जाती है ।) इस दिन गुलाल, रंगीन जल इत्यादि दूसरोंपर डालते हैं ।
संदर्भ - सनातनका ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत