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मकरसंक्रांति

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By Bal Sanskar


   

        त्यौहार और व्रतोंको  मनानेसे ईश्वरीय शक्ति प्राप्त  होती है, जिसके माध्यमसे एक सर्वसामान्य मनुष्य भी ईश्वरकी ओर जा पाता है । इसलिए त्यौहारका अध्यात्मशास्त्र समझकर मनानेसे फलनिष्पत्ति अधिक होती है । यहां संक्रांतिके अंतर्गत विभिन्न कृत्योंका शास्त्रीय आधार प्रस्तुत कर रहे हैं ।


मकरसंक्रांति 

         इस दिन सूर्यका संक्रमण मकर राशिमें होता है । सूर्यभ्रमणके कारण निर्मित अंतर दूर करने हेतु अस्सी वर्ष उपरांत संक्रांतिका दिन एक दिन आगे बढ जाता है । इस दिन सूर्यका उत्तरायण आरंभ होता है । कर्कसंक्रांतिसे मकरसंक्रांतितकके कालको दक्षिणायन कहते हैं । मकर संक्रान्ति के दिन से सूर्य की उत्तरायण गति प्रारम्भ होती है । इसलिये इसको उत्तरायणी भी कहते हैं। तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल 'संक्रान्ति' कहते हैं।

१. संक्रांतिका महत्त्व : इस कालमें रज-सत्त्वात्मक तरंगोंकी मात्रा अधिक होती है, इसलिए यह काल साधना करनेवालोंके लिए पोषक होता है ।
 
२. संक्रांतिपर तिलके उपयोगका महत्त्व : संक्रांतिपर तिलका उपयोग अधिकाधिक प्रकारसे करते हैं, उदा. तिलयुक्त जलसे स्नान कर तिलगुड भक्षण करना तथा अन्योंको देना, ब्राह्मणोंको तिलदान, शिवमंदिरमें तिलके तेलके दीप जलाना । आयुर्वेदानुसार ठंडके दिनोंमें आनेवाली संक्रांतिपर तिलभक्षण लाभदायक होता है । अध्यात्मानुसार तिलमें किसी भी अन्य तेलकी अपेक्षा सत्त्वतरंगें ग्रहण करनेकी क्षमता अधिक होती है ।

३. तिलगुडका महत्त्व : तिलमें सत्त्वतरंगोंको ग्रहण और प्रक्षेपित करनेकी क्षमता होनेके कारण तिलगुडके सेवनसे अंतर्शुद्धि होकर साधना भली-भांति होती है । तिलगुड एक-दूसरेको बांटनेसे सात्त्विकताका लेन-देन भी होता है ।

४. हलदी-कुमकुम लगानेकी प्रथाका महत्त्व : हलदी-कुमकुम लगानेकी विधि, एक प्रकारसे ब्रह्मांडमें विद्यमान सुप्त आदिशक्तिकी तरंगोंको जागृत होने हेतु आवाहन करना है । इससे व्यक्तिपर सगुण भक्तिका संस्कार होने तथा ईश्वरके प्रति भाव बढनेमें सहायता होती है ।

५. भेंट (दान) देना : भेंट देना अर्थात् तन, मन एवं धनके त्यागद्वारा दूसरे जीवमें विद्यमान देवत्वकी शरण जाना ।  संक्रांतिका काल साधना हेतु पोषक होनेके कारण इस कालमें दी गई भेंटसे देवता शीघ्र प्रसन्न होते है व  इच्छित फलप्राप्ति होती है ।

६. दान किस वस्तुका करें ? : देवताओंके चित्र, धार्मिक ग्रंथ, पोथियां, जैसी अध्यात्म हेतु पूरक वस्तुएं दान करें ।

७. आंचलभराई : आंचलभराई, अर्थात् श्री दुर्गादेवीकी ब्रह्मांडमें कार्यरत इच्छाशक्ति का आवाहन कर श्री दुर्गादेवीकी निर्मिति अथवा कार्य करनेकी इच्छा प्रबल करना । देवताकी इच्छाशक्तिसे ही व्यक्तिको (जीवको) साधना करनेकी प्रेरणा मिलती है । साधनाके अगले चरणमें व्यक्तिको (जीवको) देवताकी कार्यरत क्रियाशक्तिसे साधनाके रूपमें प्रत्येक कर्म करनेकी शक्ति प्राप्त होती है तथा कार्यरत ज्ञानशक्तिसे जीवको वैराग्य प्राप्त होता है ।

        संक्रांतिके दूसरे दिनको किंक्रांत अथवा करिदिन कहा जाता है । इस दिन देवीने किंकरासुरका वध किया ।

            आइए, बेरस्नान का शास्त्रीय महत्त्व विशद करनेवाली दृश्यश्रव्य चक्रिका देखेंगे ।




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