सावरकरजीने मई १९०९ में बैरिस्टरकी परीक्षा उत्तीर्ण की; परंतु अंग्रेज सरकारने उन्हें उपाधि देना अस्वीकृत कर दिया । अस्वीकार करनेके अनेक कारण थे । लंदनमें मदनलाल धींगराने अंग्रेज अधिकारी कर्जन वायलीको गोली मार दी । इंग्लैंडमें एक भारतीय युवकका अंग्रेज अधिकारीको मारना एक बडा साहसपूर्ण कार्य था । मदनलालकी इस कृतिके पीछे सावरकरका ही हाथ था । भारतमें भी अंग्रेज सरकारके विरोधमें अनेक षडयंत्र रचे जा रहे थे । नाशिक षडयंत्रमें सावरकरजीके अनेक बालसाथी पकडे गए । उनके बडे बंधु गणेश सावरकरजीको आजीवन कारावास दिया गया । छोटे भाई नारायण सावरकरको भी सरकारने पकड लिया था । इस सबके पीछे विनायक सावरकर हैं, ऐसे समाचार अंग्रेजों तक पहुंच रहे थे, इसी कारण उनकी गतिविधियोंपर विशेष ध्यान रखा जा रहा था ।
फ्रांससे लौटते समय अंग्रेज सरकारके पुलिसने सावरकरजीको बंदी बना दिया । सावरकरजीपर हिंदुस्तानमें राजद्रोह करनेका आरोप लगाकर अभियोग चलाने हेतु उनका प्रयाण हिंदुस्तानमें किया गया ।
१ जुलाई, १९१० के दिन सावरकर हिंदुस्तान आनेके लिए ‘मारिया’ बोटमें बैठे । उनपर रातदिन नेत्रोंमें अंजन डालकर दो अंग्रेज पहरेदार ध्यान दे रहे थे । सावरकरजीके मस्तिष्कमें यहांसे कैसे छूटें, यही विचार था । मारिया बोट मार्सेलिस बंदरगाहमें यांत्रिक गडबडीके कारण कुछ समय ठहरी थी । सावरकरजीने बोटका निरीक्षण कर ‘पोर्ट होल’से भागनेका निश्चय कर लिया । अनायास बोट वहां रुक गई । यहांसे तैरकर फ्रांसका तट पकड लूं तो अंतर्राष्ट्रीय नियमोंके अनुसार अंग्रेज अधिकारी मुझे पकड नहीं सकेंगे । इन सब बातोंका उन्होंने बडे ध्यानसे निरीक्षण किया । ८ जुलाई १९१० के दिन शौचालयमें जाकर कांचके दरवाजेपर अपना अंगरखा रखनेसे बाहर खडे पहरेदारोंको उनकी गतिविधि दिखाई न दी । खरोंच पडने, दाग होने अथवा त्वचा छिलनेकी भी चिंता न कर असीमित सागरमें सावरकरजी कूद गए । तैरते-तैरते वे फ्रांसके समुद्रतटपर पहुंच गए, परंतु अंग्रेज सैनिकोंकी दी गई गूसके कारण फ्रांसके आरक्षकोंने उन्हें अंग्रेजोंको सुपुर्द कर दिया ।
इन घटनाओंका अध्ययन करनेपर कुछ बातें स्पष्टरूपसे ध्यानमें आतीr हैं । समुद्रमें कूदकर तट तक तैरकर जानेका निर्णय लेना किसी भीरूका काम नहीं, इसके लिए प्रबल शारीरिक शक्ति एवं मनकी दृढता आवश्यक हैं । दूसरी बात कानूनका व्यवस्थित अध्ययन एवं उसका अचूक उपयोग करनेकी बुद्धि । उनकी यही बातें मुझे बहुत अच्छी लगी । अनेक बार ऐसा भी लगता है कि कहीं योगसामथ्र्यसे ‘लघिमा’ ‘गरिमा’ जैसी योगसिद्धियां तो उन्हें प्राप्त नहीं ? कारण इतनेसे छेदसे सपूंर्ण देह बाहर निकलना सचमें आश्चर्यजनक ही है ।
सावरकरजीकी यह कूद देखकर लोककवि मनमोहनजी कहते हैं,
यह छलांग देखकर मृत्यु कर्तव्य भूल बैठा ।
बुर्जसे कूदा हुआ झांसीका घोडा भी हंस पडा ।।
वासुदेव बळवंतका कंठ हर्षसे गदगद हो उठा ।
क्रांतिके केतुका आकाश गरज उठा ।।
विश्वमें केवल हैं विख्यात दो शूरवीर ।
जो गए माताके लिए सागरको लांघकर ।
हनुमानके उपरांत है उस विनायकका मान ।।
- लोककवि मनमोहनजी
भारत आनेपर मुंबईमें विशेष न्यायालयकी स्थापना कर सावरकरपर अंग्रेज सरकारने अभियोग चलाया । नाशिक षडयंत्रके दूसरे अभियोगका काम भी अभी चल ही रहा था । मई १९०९में दोनों अभियोगोंका निर्णय हुआ एवं सावरकरजी को दो बार आजीवन कारावास अर्थात ५० वर्ष कालापानीका दंड दिया गया । यह सुनकर भी उस वीरकी प्रसन्नतापर कुछ प्रभाव न पडा । एक अंग्रेज अधिकारीने उनसे कुत्सित रीतिसें ५० वर्षके दंडके विषयमें कहा, तब सावरकरजीने ही उससे प्रतिप्रश्न किया, ‘क्या ब्रिटिश सरकार यहां ५० वर्ष टिक पाएगी ?’
सावरकरजीकी यह भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई एवं भारत १५ अगस्त १९४७ को स्वतंत्र हो गया ।